नाभिकीय तकनीक का कृषि, उद्योग एवं चिकित्सा में क्या उपयोग है?
दो विधियों नाभिकीय संलयन या विखंडन द्वारा नाभिकीय ऊर्जा प्राप्त किया जा सकता है। नाभिकीय तकनीक (Nuclear Technology) का उपयोग रक्षा और सामरिक, कृषि, स्वास्थ्य, उद्योग आदि के लिये होता है। लेकिन इसके उपयोग में अत्यधिक जोखिम होने के कारण इसके उपयोग को सीमित करती है।
रक्षा और सामरिक कार्यों के लिए नाभिकीय तकनीक का प्रयोग नाभिकीय हथियार बनाने में किया जाता है।
भारत में परमाणु उर्जा उत्पन्न करने की शुरुआत 1954 में Department of atomic energy के स्थापना के साथ हुआ। 1960 के दशक में जहांगीर भाभा के नेतृत्व में तीन चरणीय नाभिकीय ऊर्जा प्रणाली को प्रारुप दिया गया।
नाभिकीय तकनीक का स्वास्थ्य क्षेत्र में प्रयोग
कृत्रिम समस्थानिक जिन्हें प्रयोगशाला में निर्मित किया जाता है द्वारा बिमारियों का पता लगाने और उपचार करने में मदद मिलती है। इन कृत्रिम समस्थानिको को न्युक्लियर मेडिसिन भी कहा जाता है। बिमारियों का पता लगाने में प्रयुक्त प्रमुख समस्थानिक है- Na-24 जिसका उपयोग रक्त अध्ययन में किया जाता है, I-131 का उपयोग थायराइड ग्रंथि के क्रियाशीलता का पता लगाने में किया जाता है, Ar-74 का प्रयोग ट्युमर का पता लगाने में होता है। इनके अलावा अन्य समस्थानिक भी है जिनका उपयोग बिमारियों का पता लगाने में किया जाता है।बिमारियों के उपचार में कृत्रिम समस्थानिक का प्रयोग विकिरण उत्पन्न कर कोशिकाओं और ऊतकों के वृद्धि को नियंत्रित करने में होता है।
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नाभिकीय तकनीक का कृषि क्षेत्र में उपयोग
कृत्रिम समस्थानिक से विभिन्न प्रकार के बीज बनायें जाते हैं। इन बीजों की मदद से सुखे से ग्रसित, नमक से ग्रसित तटवर्तीय अर्द्ध शुष्क और शुष्क क्षेत्रों को कृषि क्षेत्र के रुप में परिवर्तित किया जा सकता है।
कृत्रिम समस्थानिक का प्रयोग जैसे कि P-32 का प्रयोग उर्वरक के साथ मिलाकर खेतों में देने से मिट्टी की उर्वरता खाद के घुलने की दर, पोषक तत्वों का पौधो के द्वारा अवशोषण की दर, पोषक तत्वों का पौधो में वितरण, पौधो की वृद्धि दर, पौधो पर कीट पतंगों, खरपतवार सुखे इत्यादि का प्रभाव ज्ञात किया जाता है।
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नाभिकीय तकनीक का खाद्य्य पदार्थों के संरक्षण में उपयोग
कम उर्जा वाले नाभिकीय विकिरण का उपयोग कर खाद्य्य पदार्थों को सुरक्षित रखा जा सकता है। विकिरण का उपयोग करने से खाद्य्य पदार्थों में निम्न प्रक्रियाएं होती है जिसके कारण खाद्य्य पदार्थ सुरक्षित रहता है।
- रासायनिक बंधन टुट जाते हैं जैविक प्रक्रिया धीमी हो जाती है।
- जीवाणु, विषाणु, फुफंदी इत्यादि मर जाते हैं।
- विकिरण नियंत्रित होना चाहिए
- विकिरण से सुरक्षा के उपाय होने चाहिए
- इसे हरी सब्जियों एवं वर्षा रहित पदार्थ जैसे की मांस, मछली, अंडे इत्यादि के लिए अनुपयुक्त माना गया है।
नाभिकीय तकनीक के औद्योगिक उपयोग
नाभिकीय विकिरण का उपयोग औद्योगिक संरचना की सुदृढ़ता जांच करने में, रासायनिक अभिक्रिया में उत्प्रेरक के रुप में किया जाता है।
कार्बन डेटिंग:- यह प्रक्रिया कार्बन के समस्थानिक C-14 के अर्द्ध आयु पर आधारित है। वायुमंडल में C-14 का निर्माण, N-14 से होता है। प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया द्वारा C-12 के साथ C-14 भी पौधो में संश्लेषित हो जाता है। जीवन अवधि के दौरान C-14 और C-12 का अनुपात निश्चित बना रहता है। मृत्यु उपरांत C-14 अपने अर्द्ध आयु के अनुसार अपघटित होकर C-12 में परिवर्तित होता जाता है। इनदोनो अनुपातों की अर्द्ध आयु के सापेक्ष तुलना करने पर जीवाश्म की आयु ज्ञात हो जाती है। इस विधि का उपयोग कर 10 लाख साल वाले जीवाश्मों की आयु ज्ञात की जा सकती है।

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